याद आते है वो दिन जब हम बच्चे थे

याद आते है वो दिन जब हम बच्चे थे,
दिमाग से कच्चे पर मन के सच्चे थे।
ना ओड़ा करते थे कोई मौखोटा,
ना पैसे कमाने की दौड़ मैं कोई था लगा।
कोई क्या सोचेगा की परेशानी से एकदम दूर,
खुल के हँसने के वो दिन थे भरपूर।
गर्मियों की छुट्टियों का रहता था बेसब्री से इंतेज़ार
ऊंच नीच का पापड़ा खेलने को हर बच्चा रहता था तैयार।
तू छोटा , मैं बड़ा की किसको थी पड़ी,
लोहा लकड़ मे एक दूसरे का हाथ थाम मिलकर बनाते थे लड़ी।
आज वो मुहउल्ले के बच्चे बड़े हो गए हैं,
मेट्रो की भीड़ मे ना जाने कहाँ खो गए हैं।
वो घंटो की मस्ती आज हाई हेलो में सिमट कर रह गयी,
वो नादानियाँ मोबाइल स्क्रीन के पीछे छिप कर रह गयी।
दिन भर जो धूल में खेला थे करते,
आज तोह मिट्टी में हाथ डालने से भी है डरते।
आज सब कुछ बदल गया है,
जिंदगी की भीड़ में ना जाने वो बचपना कहीं छूट गया है।
याद आते है वो दिन जब हम बच्चे थे,
दिमाग से कच्चे पर मन के सच्चे थे।

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